ये कविता हमारे भारतीय समाज की महिलाओं की जरुरत है ये कविता हमारे भारतीय समाज की महिलाओं की जरुरत है
नारी जो 'अबला' थी कभी, अचानक 'सबला' कहलाने लगी, चार किताबें क्या पढ़ लीं, जाने कैसे-कैसे ख्वाब सजाने... नारी जो 'अबला' थी कभी, अचानक 'सबला' कहलाने लगी, चार किताबें क्या पढ़ लीं, जाने क...
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गर्मियां प्रतीक है विनाश और सृजन का। गर्मियां प्रतीक है विनाश और सृजन का।
घूंघट में उंगलियों की खिड़की बना वो देख रही है नारियों को। घूंघट में उंगलियों की खिड़की बना वो देख रही है नारियों को।
इस कलयुग में नारी बनकर मीरा, ढूंढ रही हैं कृष्ण को । इस कलयुग में नारी बनकर मीरा, ढूंढ रही हैं कृष्ण को ।